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“जागतिक वारसा स्थळांचा इतिहास महाराष्ट्राच्या विशेष संदर्भासह” या पुस्तकात केवळ माहिती ची जंत्री नाही, तर यात सामाजिक इतिहासाच्या अनुषंगाने, पर्यटन भूगोलाचा विचार करून, सामान्य मध्यवर्गीयाच्या खिशाच्या अर्थशास्त्राच्या दृष्टीने व पर्यटन करणाऱ्याच्या मानसिकतेचा- मानसशास्त्राचा वेध घेण्याचा प्रयत्न करणारे हे 100-125 पानांचे छोटेखानी पुस्तक आहे. या सामाजिकशास्त्रांचा विचार करताना जागतिक वारसा का ? कसा ? कशा रितीने ? जपला पाहिजे. या प्रश्नांचा उत्तरांचा मागोवा घेण्याचा प्रामाणिक प्रयत्न या पुस्तकात केलेला आहे.
….प्रा.विजयकुमार विनायक भवारी

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“जागतिक वारसा स्थळांचा इतिहास महाराष्ट्राच्या विशेष संदर्भासह” या पुस्तकात केवळ माहिती ची जंत्री नाही, तर यात सामाजिक इतिहासाच्या अनुषंगाने, पर्यटन भूगोलाचा विचार करून, सामान्य मध्यवर्गीयाच्या खिशाच्या अर्थशास्त्राच्या दृष्टीने व पर्यटन करणाऱ्याच्या मानसिकतेचा- मानसशास्त्राचा वेध घेण्याचा प्रयत्न करणारे हे 100-125 पानांचे छोटेखानी पुस्तक आहे. या सामाजिकशास्त्रांचा विचार करताना जागतिक वारसा का ? कसा ? कशा रितीने ? जपला पाहिजे. या प्रश्नांचा उत्तरांचा मागोवा घेण्याचा प्रामाणिक प्रयत्न या पुस्तकात केलेला आहे.
….प्रा.विजयकुमार विनायक भवारी

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Weight 0.2 kg
Dimensions 24 × 16 × 3 cm
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राष्ट्रवाद और कड़े तेवरों के अलावा, अक्षय के काव्य में एक युवा मन की कोमलता भी बसती है। जीवन की कशमकश, करियर की चिंता, दोस्तों की दुनियादारी, रिश्तों का टूटना और अकेलेपन से लड़कर मंज़िल पाने का जज़्बा उनकी कविताओं को आम युवाओं से जोड़ता है।
संक्षेप में, अक्षय राजूरकर एक ऐसे कवि हैं जिनकी आवाज़ में युवाओं का शंखनाद, मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण और ‘भारत को भव्य’ बनाने का दृढ़ संकल्प गूँजता है।
पूर्व में अभाविप जैसे संगठन में सक्रियता से कार्यरत रहे हैं। गढ़चिरोली और मणिपुर राज्य के अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में प्रत्यक्ष काम का अनुभव किया है। इनका जनजाति और सेवा कार्य से विशेष लगाव है।

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