Additional information
| Weight | 125 kg |
|---|---|
| Dimensions | 21.5 × 14 cm |
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| Dimensions | 21.5 × 14 cm |
The Gyanpeeth prize in literature in Marathi has been awarded to three saraswatas, namely shri. V.S. Khandekar, Shri. V.D. Karandikar and Kusumagraja, Shri. V. V. Shirwadkar. The life and their lifestyle can be made known through this book, the only one available in Marathi.
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अक्षय पुष्पा प्रभाकर राजूरकर मुख्य रूप से आष्टी, जिला वर्धा (महाराष्ट्र) से जुड़े एक युवा, ओजस्वी और संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी कविताओं का संग्रह उनके प्रखर राष्ट्रवादी विचारों, सामाजिक सरोकारों और एक संघर्षरत युवा के अंतर्मन का सजीव दस्तावेज़ है।
अक्षय की लेखनी में ‘वीर रस’ और ‘देशप्रेम’ की गहरी छाप है। वे छत्रपति शिवाजी महाराज, लोकमान्य तिलक, चंद्रशेखर आज़ाद और वीर सावरकर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जैसे राष्ट्रीय नायकों से अत्यंत प्रभावित हैं और अखंड भारत तथा ‘राम राज्य’ की पुनर्स्थापना का स्वप्न देखते हैं।
इतिहास और संस्कृति के प्रति गौरव के साथ-साथ, कवि समसामयिक मुद्दों- जैसे पूर्वोत्तर (मणिपुर) की स्थिति, आतंकवाद, जी-20 सम्मेलन और वर्तमान राजनीति – पर भी अपनी लेखनी के माध्यम से बेबाक और तीखा प्रहार करते हैं।
राष्ट्रवाद और कड़े तेवरों के अलावा, अक्षय के काव्य में एक युवा मन की कोमलता भी बसती है। जीवन की कशमकश, करियर की चिंता, दोस्तों की दुनियादारी, रिश्तों का टूटना और अकेलेपन से लड़कर मंज़िल पाने का जज़्बा उनकी कविताओं को आम युवाओं से जोड़ता है।
संक्षेप में, अक्षय राजूरकर एक ऐसे कवि हैं जिनकी आवाज़ में युवाओं का शंखनाद, मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण और ‘भारत को भव्य’ बनाने का दृढ़ संकल्प गूँजता है।
पूर्व में अभाविप जैसे संगठन में सक्रियता से कार्यरत रहे हैं। गढ़चिरोली और मणिपुर राज्य के अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में प्रत्यक्ष काम का अनुभव किया है। इनका जनजाति और सेवा कार्य से विशेष लगाव है।
“इतिहासात काही जागा कायमच्या रीक्त असतात. तिथं असे काही बिंदू उपलब्ध असतात, ज्यांच्या पुढं आणि मागं बऱ्याच घटना लिखित स्वरूपात उपलब्ध असतात. पण नेमकं मोक्याच्या ठिकाणी शून्य असतं. तिथं इतिहास मौन पाळतो. त्या गाळलेल्या जागी असंच घडलं असावं, असं छातीठोकपणे सांगता येत नाही. अशा रीक्त जागा इतिहासकारांना कुणावरही अन्याय न करता साकल्यानं भरून काढता येतात. जसं की, तुम्ही एखाद्या मध्ययुगीन किल्ल्यावर गेलात, तर मध्येच अशा काही अंधारवाटा लागतात. तशा अंधारवाटा आपण गतायुष्यातील अनुभव आणि सहज तर्क लावून पार करतो. इतिहासाच्या क्षेत्रात सुद्धा विवेकाची किनार धरून अशा अंधारवाटा पार करता येतात. ते फार कठीण काम नाही. एखाद्या विशिष्ट प्रसंगी इतिहास बोलत नसेल तर त्याला वेगळ्या पद्धतीनं बोलतं करता येतं.”
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